खालसा पंथ स्थापना दिवस एवं बैसाखी पर्व पर विशेष लेख

Khalsa Panth foundation Day : Baisakhi occasion

खालसा पंथ स्थापना दिवस एवं बैसाखी पर्व पर विशेष लेख

*सिक्ख पंथ की स्थापना और फसलों की कटाई की खुशी का पर्व है बैसाखी*

 धर्म, साहस और “आपे गुरु चेला” अर्थात स्वयं गुरु बने फिर खुद ही बने शिष्य |  महान परंपरा 

बैसाखी का पावन पर्व सिख इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है, जब गुरु गोबिंद सिंह जी ने सन 1699 में आनंदपुर साहिब की पावन धरती पर खालसा पंथ की स्थापना की। यह स्थापना किसी साधारण धार्मिक आयोजन का परिणाम नहीं थी, बल्कि उस समय के सामाजिक अन्याय, धार्मिक अत्याचार और मानवाधिकारों के हनन के विरुद्ध एक क्रांतिकारी कदम था।

उस समय समाज में भय, भेदभाव और जबरन धर्म परिवर्तन जैसी समस्याएं बढ़ रही थीं। आम जनमानस में साहस और आत्मसम्मान की कमी हो रही थी। ऐसे समय में गुरु गोबिंद सिंह जी ने एक ऐसे पंथ की स्थापना की, जो न केवल आध्यात्मिक रूप से जागरूक हो, बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने का साहस भी रखे।

 खालसा पंथ का मूल उद्देश्य था—“संत सिपाही” तैयार करना, जो भक्ति और शक्ति दोनों का संतुलन बनाए रखे।

बैसाखी के ऐतिहासिक दिवस पर गुरु जी ने विशाल सभा में आव्हान किया कि जो देश धर्म के लिए अपने प्राणों का त्याग कर सकता है वो सामने आए 

सभा में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया फिर पीछे से एक व्यक्ति उठा और सहजता से चलते हुए गुरु गोबिंद सिंह जी के पास आया और बोला कि मैं अपने प्राणों का बलिदान देने को तैयार हूं गुरु गोविंद सिंह जो उसे समय गोविंद राय कहलाते थे उन्हें अंदर ले गए और पंडाल के पीछे से तलवार चलने की जोरदार आवाज आई और खून की धार सभा की तरफ बहने लगी गुरुजी बाहर आए उनके हाथों में रक्त रंजित तलवार थी उन्होंने दोबारा आवाज लगाइए और कौन गुरु का प्यार देश और धर्म के लिए जान दे सकता है फिर एक व्यक्ति उठा और उसने भी देश धर्म के लिए अपने प्राण कुर्बान करने की बात कही गुरुजी उससे भी अंदर ले गए फिर जोरदार आवाज और खून की धार |

 इस तरह एक-एक कर पांच लोगों को गुरु जी पंडाल के पीछे ले गए और खून की धार बाहर बहती रही पूरी सभा में सन्नाटा लोग आश्चर्य में थे कि गुरु जी ने यह क्या किया क्यों किया, “ यह परीक्षा केवल आस्था की नहीं, बल्कि समर्पण, साहस और विश्वास की थी। जब पाँच सिख इस परीक्षा में खरे उतरे, तब गुरु जी ने उन्हें अमृत पान करवाकर खालसा बनाया। इसके पश्चात जो घटना घटी, वही सिक्ख परंपरा की सबसे अद्वितीय और प्रेरणादायक मिसाल बनी।

गुरु गोविंद सिंह जी ने स्वयं उन्हीं पाँच प्यारों से अमृत ग्रहण किया और स्वयं को भी खालसा में शामिल किया। उसके बाद से गुरु गोविंद राय का नाम गुरु गोबिंद सिंह पड़ा |

 यही वह ऐतिहासिक क्षण है, जिसके कारण सिख परंपरा में कहा जाता है 

“वाह वाह गोबिंद सिंह, आपे गुरु चेला”

इस पंक्ति का गहरा अर्थ है कि गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु और शिष्य के बीच की दूरी को समाप्त कर दिया। उन्होंने यह संदेश दिया कि सच्चा गुरु वही है, जो स्वयं भी उसी अनुशासन, मर्यादा और नियमों का पालन करे, जो वह अपने अनुयायियों को सिखाता है।

उन्होंने स्वयं को ऊँचा नहीं रखा, बल्कि अपने अनुयायियों के साथ समान स्तर पर खड़ा किया।

यह समानता, विनम्रता और नेतृत्व का सर्वोच्च उदाहरण है।

इससे यह सिद्ध होता है कि सिख पंथ में किसी भी प्रकार का ऊँच-नीच या भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। आज भी गुरुद्वारों में गरीब - अमीर सब एक साथ एक लाइन में बैठकर लंगर ग्रहण करते हैं |

आज के समय में, जब समाज अनेक चुनौतियों से गुजर रहा है—नैतिक मूल्यों में गिरावट, आपसी विभाजन, और युवाओं का भटकाव—तब गुरु गोबिंद सिंह जी का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। हमें यह सीख मिलती है कि नेतृत्व केवल आदेश देने का नहीं, बल्कि स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करने का नाम है।

छत्तीसगढ़ की पावन धरती पर सिख समाज सदैव “सरबत दा भला” की भावना के साथ सेवा, सद्भाव और भाईचारे का संदेश देता आया है। आज बैसाखी के इस पावन अवसर पर हम सभी को यह संकल्प लेना चाहिए कि हम गुरु साहिब के दिखाए मार्ग पर चलते हुए समाज में न्याय, समानता और सेवा की भावना को और सुदृढ़ करें।

“खालसा मेरो रूप है खास, खालसे में हाउ करौं निवास” — यह वचन हमें याद दिलाता है कि खालसा केवल एक पहचान नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है।

 

आस्था, साहस और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश

बैसाखी का पावन पर्व सिख समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक अवसर है। यह केवल फसल कटाई का उत्सव नहीं, बल्कि धर्म, साहस, समानता और सेवा के मूल्यों को आत्मसात करने का दिन भी है। आज के बदलते सामाजिक और वैश्विक परिदृश्य में बैसाखी हमें अपने मूल सिद्धांतों की ओर लौटने और उन्हें व्यवहार में उतारने का संदेश देती है।

बैसाखी का दिन हमें उस ऐतिहासिक क्षण की याद दिलाता है जब गुरु साहिब ने समाज में व्याप्त अन्याय, भेदभाव और भय को समाप्त करने के लिए खालसा पंथ की स्थापना की। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों—असमानता, तनाव, और नैतिक पतन—से जूझ रहा है।

*हम बैसाखी के संदेश को केवल उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएं।*

धर्म का पालन केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहकर सत्य, ईमानदारी और न्याय के मार्ग पर चलना है।

*सेवा (सेवा भाव) के माध्यम से जरूरतमंदों की सहायता करना ही सच्ची श्रद्धा है।*

समानता और भाईचारा आज के समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जहाँ जाति, धर्म और वर्ग के भेद को समाप्त करना हमारा कर्तव्य है।

छत्तीसगढ़ की धरती पर सिक्ख समाज हमेशा से सेवा, सद्भाव और भाईचारे का प्रतीक रहा है। चाहे प्राकृतिक आपदाएं हों या सामाजिक संकट, सिख समाज ने “सरबत दा भला” के सिद्धांत पर चलते हुए हर जरूरतमंद की सहायता की है। 

आज भी हमें यही संकल्प लेना होगा कि हम अपने आसपास के समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करेंगे।

*आज की परिस्थितियों में जब युवाओं के सामने अनेक भटकाव और चुनौतियाँ हैं, बैसाखी उन्हें सही दिशा देने का अवसर है। उन्हें अपने इतिहास, संस्कृति और मूल्यों से जोड़ना, उन्हें नशे और गलत रास्तों से दूर रखना और समाज के प्रति जिम्मेदार बनाना हम सभी की जिम्मेदारी है।*

बैसाखी हमें यह सिखाती है कि सच्चा उत्सव वही है जिसमें समाज का हर वर्ग खुशहाल और सुरक्षित हो। 

इस पावन अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि हम धर्म, सेवा, और मानवता के मार्ग पर चलकर एक बेहतर समाज का निर्माण करेंगे।

“नानक नाम चढ़दी कला, तेरे भाणे सर्वत दा भला”

बैसाखी की सभी को हार्दिक बधाई : शुभकामनाएं।

सुखबीर सिंह सिंघोत्रा, प्रदेश अध्यक्ष

छत्तीसगढ़ सिक्ख समाज

9301094242