दही-हांडी भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा उत्‍सव है

दही-हांडी भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा उत्‍सव है

भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला से संबंध दही-हांडी की मूल कथा भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप से जुड़ी है. धार्मिक कथाओं के अनुसार, श्रीकृष्ण को दही और मक्खन बहुत पसंद था. वे अपने मित्रों के साथ मिलकर गोकुल की गलियों में घूमते थे. मौका मिलते ही वे गोपियों के घरों से दही और मक्खन चुरा लेते थे. गोपियां श्रीकृष्ण की इस शरारत से परेशान रहती थीं. उन्होंने मक्खन और दही की मटकी को ऊंचाई पर टांगना शुरू कर दिया. उनका उद्देश्य था कि बाल कृष्ण मटकी तक न पहुंच सकें. श्रीकृष्ण ने इसका भी उपाय खोज लिया. वे अपने सखाओं को एक जगह इकट्ठा करते थे. इसके बाद सभी बच्चे एक-दूसरे के कंधों पर चढ़ते थे. वे मानव पिरामिड बनाते थे.

सबसे ऊपर पहुंचने वाला बच्चा मटकी फोड़ देता था. इसके बाद सभी मित्र मिलकर मक्खन और दही खाते थे. आज की दही हांडी इसी लीला का प्रतीकात्मक रूप है. गोविंदा पथक मानव पिरामिड बनाते हैं. सबसे ऊपर का सदस्य मटकी फोड़ता है. इस तरह उत्सव में श्रीकृष्ण की नटखट लीला को दोहराया जाता है.

दही हांडी का क्या है धार्मिक-सामाजिक अर्थ?

दही-हांडी केवल मटकी फोड़ने का खेल नहीं है. इसका धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ भी है. इसमें मटकी को भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला का प्रतीक माना जाता है. दही और मक्खन को प्रेम, सरलता और आनंद से जोड़ा जाता है. ऊंचाई पर बंधी मटकी जीवन के लक्ष्य का संकेत देती है. लक्ष्य जितना ऊंचा होता है, उसे पाने के लिए उतना ही अधिक प्रयास करना पड़ता है. मानव पिरामिड सामूहिक शक्ति का प्रतीक है. इस आयोजन में हर व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. नीचे खड़े लोग पूरे पिरामिड का भार संभालते हैं. बीच के सदस्य संतुलन बनाए रखते हैं. सबसे ऊपर का सदस्य मटकी तक पहुंचता है. इससे सहयोग, विश्वास और अनुशासन का संदेश मिलता है.